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Wednesday, June 22, 2022

राजकुमारी

एक राजकुमारी को अपनी एक दासी बड़ी प्रिय थी। एक बार वह दासी बीमार पड़ गई तो अपने पति को सूचना पहुँचाने के लिए भेजा। दैवयोग से दासी के पति की नजर राजकुमारी पर पड़ गई। न मालूम क्या हुआ, पर राजकुमारी को देखते ही दासी के पति के मन में उस राजकुमारी को भोगने की वासना जाग गई। पर आखिर यह तो असंभव ही था, तो स्वयं को उपायहीन जानकर वह उदास घर लौटा। राजकुमारी ऐसी दिल में उतर गई थी कि लाख प्रयास करने पर भी वह भूलती ही न थी। इसी कारण दासी के पति की जीने की इच्छा जाती रही और वह उदास ही रहने लगा। दासी ने अपने पति से उदासी का कारण पूछा तो उस ने सब सत्य बता दिया। अब वह दासी भी अपने पति की उदासी से उदास रहने लगी। जब वह दासी स्वस्थ होकर पुनः राजकुमारी की सेवा में पहुँची, तो अब राजकुमारी ने उस दासी से उसकी उदासी का कारण पूछा। पर दासी डर के मारे बताती नहीं। एक दिन राजकुमारी ने जानने की जिद्द पकड़ ली, बोली- चाहे जो भी हो। बताओ तुम्हें क्या परेशानी है? कैसी भी बात हो, मुझे सत्य बता दो, मैं वचन देती हूँ कि मैं दण्ड नहीं दूंगी, बल्कि हर हालत में तुम्हारी परेशानी दूर करूँगी। दासी ने सारी बात बताई। राजकुमारी ने कहा- यह तो धर्मसंकट है। पर मैं वचन दे चुकी हूँ। एक उपाय है, अपने पति से कहो कि वो संत हो जाए। यदि वह संत हो जाए तो मैं उसकी हो सकती हूँ। दासी ने सारी बात अपने पति को बताई। पति एक संत के पास पहुँचा और बोला- मुझे संत बनना है। संत ने उसे भगवान का नाम जपने को दिया और कहा कि भगवान का कोई एक स्वरूप पकड़ कर, खूब नाम जपो। पति ने पूछा- भगवान का स्वरूप तो पकड़ में कैसे आए? उस युवती का ही स्वरूप मन से नहीं छूटता। (ध्यान दें कि यही वह प्रश्न है जो दुनिया वाले अक्सर पूछा करते हैं।) संत ने कहा- उसमें भी तो भगवान ही हैं, उसी का स्वरूप सही, पर उसे सामान्य स्त्री समझकर नहीं, भगवान ही मान कर, नाम जप। उसने ऐसा ही किया। लगन तो सकाम थी पर काम कर गई। वह वास्तव में ही संत हो गया। राजकुमारी आई भी। पर अब मन में कामना ही न रही। लोकेशानन्द कहता है कि आप भी भगवान का स्वरूप न पकड़ पा रहे हों तो संसार में अपने सबसे प्रिय को ही भगवान मानकर, उसी का स्वरूप पकड़कर, भगवान के एक नाम 'राम' या 'ओऽम्' का खूब जप करें। आप भी संत हो जाएँगे।

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