*बाहुबली की तपश्चर्या* जैन परंपरा में एक बहुत मीठी कथा है। ऋषभ के सौ पुत्र थे। अनेक पुत्रों ने ऋषभ से दीक्षा ले ली। वे संन्यास की यात्रा पर निकल गए। बाहुबली भी ऋषभ के एक पुत्र थे। उन्होंने जरा देर की दीक्षा लेने में; कुछ सोच-विचार किया। लेकिन तब तक बाहुबली से छोटे बेटे दीक्षित हो गए। और जब बाहुबली के मन में दीक्षा का खयाल आया, तो उसके अहंकार को बड़ी पीड़ा हुई कि अपने छोटे भाइयों को संन्यास के जगत में तो मुझे प्रणाम करना पड़ेगा। क्योंकि वे मुझसे अग्रणी हो गए। उनके संन्यास की यात्रा बड़ी हो गई। अपने से छोटों को और मैं नमस्कार करूं, यह न हो सकेगा! तो उसने सोचा, ऐसी भी क्या जरूरत है। मैं खुद ही साधना क्यों न कर लूं! बलशाली व्यक्ति था। कमजोर तो हारते ही हैं, कभी-कभी बलशाली बुरी तरह हारते हैं। बल ही उनके हारने का कारण हो जाता है। तो बाहुबली एकांत में जाकर गहन तपश्चर्या में, सघन तपश्चर्या में लीन हुए। शायद इस पृथ्वी पर कम ही लोगों ने ऐसी तपश्चर्या की होगी और ऐसी साधना की होगी। सब कुछ दांव पर लगा दिया। सब कुछ। बस, एक छोटी-सी चीज छोड़कर; वह मैं पीछे खड़ा रहा। उनकी तपश्चर्या की ख्याति कोने-कोने तक पहुंच गई। जहां भी लोग सोचते-समझते थे, वहां तक बाहुबली की खबर पहुंची। और लोग हैरान हुए कि इतना पवित्रतम व्यक्ति, इतना शुद्धतम व्यक्ति, सब कुछ दांव पर लगाए खड़ा है, फिर भी कोई दर्शन नहीं हो रहा है सत्य का! क्या बात है? ऋषभ के पास भी खबर पहुंची। ऋषभ मुस्कुराए और उन्होंने बाहुबली की एक बहन को, जो दीक्षित हो गई थी, बाहुबली के पास भेजा और कहा, बस, जरा-सा तिनका अटका हुआ है। लेकिन वह तिनका पहाड़ों से भी भारी है। सब दांव पर लगा दिया है, सिर्फ मैं को बचा लिया है! और आप कुछ भी दांव पर न लगाएं, सिर्फ मैं को दांव पर लगा दें, तो हल हो जाए। लेकिन सब दांव पर लगा दें-धन, दौलत, यश, शरीर, मन--लेकिन एक पीछे मैं बच जाए, तो सब बेकार है। वह दांव पर लगाने वाला पीछे बच जाए, तो आप परमात्मा से संघर्ष कर रहे हैं; आप परमात्मा से प्रार्थना नहीं कर रहे हैं। तो आप सत्य को भी विजय करने निकले हैं; सत्य के साथ एक होने नहीं निकले हैं। यह कोई प्रेम की यात्रा नहीं है; यह कोई युद्ध, आक्रामक चित्त की दशा है। सब दांव पर है बाहुबली का। कुछ बचा नहीं लगाने को। वह भी चिंता में पड़ा, अब और क्या करने को बचा है? जितने उपवास कहे हैं तीर्थंकरों ने, सब पूरे कर डाले। जितने जागरण के लिए कहा है, उतनी रातें जागकर बिता दीं। कहा है खड़े रहो, तो महीनों खड़ा रहा हूं। कहा है कि चित्त को एकाग्र कर लो, तो चित्त एकाग्र है। सब शर्तें पूरी हैं। फिर कुछ हो तो नहीं रहा है। कहीं कोई कमी तो नहीं दिखाई पड़ती। फिर ऋषभ के द्वारा भेजी गई बाहुबली की बहन ने--बाहुबली आंख बंद किए। विशालकाय व्यक्ति था। सुंदरतम शरीर वाला व्यक्ति था। गोमटेश्वर में बाहुबली की प्रतिमा है, कभी आपने चित्र देखे होंगे। विशालकाय! जिसमें शरीर पर बेलाएं चढ़ गई हैं। और पक्षियों ने कान में घोंसले बना लिए थे। और शरीर पर बेलाएं चढ़ गई थीं, उसका उन्हें पता भी नहीं था। क्योंकि वह तो अंतर के संघर्ष में इतना लीन था कि शरीर पर क्या घट रहा है, उसे पता भी नहीं था। बहन ने चारों तरफ से जाकर बाहुबली को देखा। इतना घोर तपस्वी तो कभी देखा नहीं गया! कान पर पक्षियों ने घोंसले बना लिए हैं; अंडे रख दिए हैं। सुरक्षित जगह है। बाहुबली हिलता भी नहीं। बेलाएं चढ़ गई हैं। बेलाओं में फूल आ गए हैं। न मालूम कब से बाहुबली ऐसा ही खड़ा है पत्थर की तरह। अब और क्या बाकी है? और तब गहरे और गहरे घूमकर बहन ने भीतर तक झांकने की कोशिश की। और उसे दिखाई पड़ा कि भीतर बस एक चीज बाकी रह गई, वह मैं। तो एक गीत बाहुबली की बहन ने गाया कि सब कर चुके तुम, अब जरा सिंहासन से नीचे उतर आओ! बस, और कुछ न करो, जरा सिंहासन से नीचे उतर आओ। यह हाथी की पालकी पर कब तक बैठे रहोगे! जरा नीचे उतर आओ। और बाहुबली को यह सुनाई पड़ा कि हाथी की पालकी पर कब तक बैठे रहोगे! जरा नीचे उतर आओ। सब शुद्ध था। बस, वह एक पालकी अहंकार की भारी थी। और उसी क्षण घटना घट गई। इतनी बड़ी तपश्चर्या से जो न हुआ था, पालकी से उतरते ही हो गया। बाहुबली ने झुककर बहन को नमस्कार कर लिया। बात समाप्त हो गई। घटना घट गई। करोड़ लोग प्रयास करते हैं, एक पहुंचता है। क्योंकि वह एक ही अपनी अस्मिता को और अहंकार को खोता है। जो लोग भी प्रभु की दिशा में यात्रा शुरू करते हैं, करोड़ में से एक ही समर्पण करता है। करोड़ में से एक यात्रा करता है। अगर करोड़ यात्रा करें, तो एक समर्पण करता है। बाकी लोग संकल्प करते हैं, समर्पण नहीं। बाकी लोग कहते हैं, हम प्रभु को पाकर रहेंगे। तू कहां है, हम खोजकर रहेंगे। हम अपनी पूरी ताकत लगाएंगे। जीवन लगा देंगे दांव पर, लेकिन तुझे पाकर रहेंगे। कभी एक आदमी ऐसा होता है, जो कहता है कि मेरी क्या सामर्थ्य! मैं असहाय हूं। मेरी कोई शक्ति नहीं है। मैं तुझे कैसे खोज पाऊंगा! अगर तू ही मुझे खोज ले, तो शायद घटना घट जाए। मैं तुझे कैसे खोज पाऊंगा! मेरी शक्ति बड़ी छोटी है। एक छोटी-सी बूंद हूं। न मालूम किस रेगिस्तान में खो जाऊं! अगर सागर ही मुझ तक आ जाए, तो ठीक। अन्यथा मैं सागर को खोज पाऊं, इसकी कोई संभावना नहीं है। जो लोग प्रभु की खोज पर निकलते हैं, वे भी अस्मिता को, अहंकार को लेकर निकलते हैं। वे कहते हैं, हम प्रभु को पाकर रहेंगे। साधना करेंगे। योग करेंगे। आसन करेंगे। ध्यान करेंगे। लेकिन पीछे वह मैं खड़ा रहेगा।
Wednesday, July 6, 2022
बाहुबली की तपश्चर्या
*बाहुबली की तपश्चर्या* जैन परंपरा में एक बहुत मीठी कथा है। ऋषभ के सौ पुत्र थे। अनेक पुत्रों ने ऋषभ से दीक्षा ले ली। वे संन्यास की यात्रा पर निकल गए। बाहुबली भी ऋषभ के एक पुत्र थे। उन्होंने जरा देर की दीक्षा लेने में; कुछ सोच-विचार किया। लेकिन तब तक बाहुबली से छोटे बेटे दीक्षित हो गए। और जब बाहुबली के मन में दीक्षा का खयाल आया, तो उसके अहंकार को बड़ी पीड़ा हुई कि अपने छोटे भाइयों को संन्यास के जगत में तो मुझे प्रणाम करना पड़ेगा। क्योंकि वे मुझसे अग्रणी हो गए। उनके संन्यास की यात्रा बड़ी हो गई। अपने से छोटों को और मैं नमस्कार करूं, यह न हो सकेगा! तो उसने सोचा, ऐसी भी क्या जरूरत है। मैं खुद ही साधना क्यों न कर लूं! बलशाली व्यक्ति था। कमजोर तो हारते ही हैं, कभी-कभी बलशाली बुरी तरह हारते हैं। बल ही उनके हारने का कारण हो जाता है। तो बाहुबली एकांत में जाकर गहन तपश्चर्या में, सघन तपश्चर्या में लीन हुए। शायद इस पृथ्वी पर कम ही लोगों ने ऐसी तपश्चर्या की होगी और ऐसी साधना की होगी। सब कुछ दांव पर लगा दिया। सब कुछ। बस, एक छोटी-सी चीज छोड़कर; वह मैं पीछे खड़ा रहा। उनकी तपश्चर्या की ख्याति कोने-कोने तक पहुंच गई। जहां भी लोग सोचते-समझते थे, वहां तक बाहुबली की खबर पहुंची। और लोग हैरान हुए कि इतना पवित्रतम व्यक्ति, इतना शुद्धतम व्यक्ति, सब कुछ दांव पर लगाए खड़ा है, फिर भी कोई दर्शन नहीं हो रहा है सत्य का! क्या बात है? ऋषभ के पास भी खबर पहुंची। ऋषभ मुस्कुराए और उन्होंने बाहुबली की एक बहन को, जो दीक्षित हो गई थी, बाहुबली के पास भेजा और कहा, बस, जरा-सा तिनका अटका हुआ है। लेकिन वह तिनका पहाड़ों से भी भारी है। सब दांव पर लगा दिया है, सिर्फ मैं को बचा लिया है! और आप कुछ भी दांव पर न लगाएं, सिर्फ मैं को दांव पर लगा दें, तो हल हो जाए। लेकिन सब दांव पर लगा दें-धन, दौलत, यश, शरीर, मन--लेकिन एक पीछे मैं बच जाए, तो सब बेकार है। वह दांव पर लगाने वाला पीछे बच जाए, तो आप परमात्मा से संघर्ष कर रहे हैं; आप परमात्मा से प्रार्थना नहीं कर रहे हैं। तो आप सत्य को भी विजय करने निकले हैं; सत्य के साथ एक होने नहीं निकले हैं। यह कोई प्रेम की यात्रा नहीं है; यह कोई युद्ध, आक्रामक चित्त की दशा है। सब दांव पर है बाहुबली का। कुछ बचा नहीं लगाने को। वह भी चिंता में पड़ा, अब और क्या करने को बचा है? जितने उपवास कहे हैं तीर्थंकरों ने, सब पूरे कर डाले। जितने जागरण के लिए कहा है, उतनी रातें जागकर बिता दीं। कहा है खड़े रहो, तो महीनों खड़ा रहा हूं। कहा है कि चित्त को एकाग्र कर लो, तो चित्त एकाग्र है। सब शर्तें पूरी हैं। फिर कुछ हो तो नहीं रहा है। कहीं कोई कमी तो नहीं दिखाई पड़ती। फिर ऋषभ के द्वारा भेजी गई बाहुबली की बहन ने--बाहुबली आंख बंद किए। विशालकाय व्यक्ति था। सुंदरतम शरीर वाला व्यक्ति था। गोमटेश्वर में बाहुबली की प्रतिमा है, कभी आपने चित्र देखे होंगे। विशालकाय! जिसमें शरीर पर बेलाएं चढ़ गई हैं। और पक्षियों ने कान में घोंसले बना लिए थे। और शरीर पर बेलाएं चढ़ गई थीं, उसका उन्हें पता भी नहीं था। क्योंकि वह तो अंतर के संघर्ष में इतना लीन था कि शरीर पर क्या घट रहा है, उसे पता भी नहीं था। बहन ने चारों तरफ से जाकर बाहुबली को देखा। इतना घोर तपस्वी तो कभी देखा नहीं गया! कान पर पक्षियों ने घोंसले बना लिए हैं; अंडे रख दिए हैं। सुरक्षित जगह है। बाहुबली हिलता भी नहीं। बेलाएं चढ़ गई हैं। बेलाओं में फूल आ गए हैं। न मालूम कब से बाहुबली ऐसा ही खड़ा है पत्थर की तरह। अब और क्या बाकी है? और तब गहरे और गहरे घूमकर बहन ने भीतर तक झांकने की कोशिश की। और उसे दिखाई पड़ा कि भीतर बस एक चीज बाकी रह गई, वह मैं। तो एक गीत बाहुबली की बहन ने गाया कि सब कर चुके तुम, अब जरा सिंहासन से नीचे उतर आओ! बस, और कुछ न करो, जरा सिंहासन से नीचे उतर आओ। यह हाथी की पालकी पर कब तक बैठे रहोगे! जरा नीचे उतर आओ। और बाहुबली को यह सुनाई पड़ा कि हाथी की पालकी पर कब तक बैठे रहोगे! जरा नीचे उतर आओ। सब शुद्ध था। बस, वह एक पालकी अहंकार की भारी थी। और उसी क्षण घटना घट गई। इतनी बड़ी तपश्चर्या से जो न हुआ था, पालकी से उतरते ही हो गया। बाहुबली ने झुककर बहन को नमस्कार कर लिया। बात समाप्त हो गई। घटना घट गई। करोड़ लोग प्रयास करते हैं, एक पहुंचता है। क्योंकि वह एक ही अपनी अस्मिता को और अहंकार को खोता है। जो लोग भी प्रभु की दिशा में यात्रा शुरू करते हैं, करोड़ में से एक ही समर्पण करता है। करोड़ में से एक यात्रा करता है। अगर करोड़ यात्रा करें, तो एक समर्पण करता है। बाकी लोग संकल्प करते हैं, समर्पण नहीं। बाकी लोग कहते हैं, हम प्रभु को पाकर रहेंगे। तू कहां है, हम खोजकर रहेंगे। हम अपनी पूरी ताकत लगाएंगे। जीवन लगा देंगे दांव पर, लेकिन तुझे पाकर रहेंगे। कभी एक आदमी ऐसा होता है, जो कहता है कि मेरी क्या सामर्थ्य! मैं असहाय हूं। मेरी कोई शक्ति नहीं है। मैं तुझे कैसे खोज पाऊंगा! अगर तू ही मुझे खोज ले, तो शायद घटना घट जाए। मैं तुझे कैसे खोज पाऊंगा! मेरी शक्ति बड़ी छोटी है। एक छोटी-सी बूंद हूं। न मालूम किस रेगिस्तान में खो जाऊं! अगर सागर ही मुझ तक आ जाए, तो ठीक। अन्यथा मैं सागर को खोज पाऊं, इसकी कोई संभावना नहीं है। जो लोग प्रभु की खोज पर निकलते हैं, वे भी अस्मिता को, अहंकार को लेकर निकलते हैं। वे कहते हैं, हम प्रभु को पाकर रहेंगे। साधना करेंगे। योग करेंगे। आसन करेंगे। ध्यान करेंगे। लेकिन पीछे वह मैं खड़ा रहेगा।
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