इंद्रप्रस्थ और वर्तमान अस्तित्व
इंद्रप्रस्थ नाम आते ही सम्पूर्ण महाभारत स्मरण हो उठता है। वो भव्य महल का स्वरूप नजर आने लगता है। यही नगर पांडवों की राजधानी थी। प्राचीन नगर इन्द्रप्रस्थ नगर द्वारका के समकालीन है। पाण्डवों की गाथा के साथ-साथ इस नगर की गाथा भी अमर है। नगर जंगलों को काट कर बनाये गये थे। इन्द्रप्रस्थ भी इसी कोटि के नगरों में आता था। अपने वैभव एवं समृद्धि की दृष्टि से यह मथुरा और द्वारका के ही बराबर समृद्ध था। पहले इस स्थान पर एक वन था, जिसे महाभारत में खांडवप्रस्थ कहा गया है। पाण्डवों ने इसे साफ कर इन्द्रप्रस्थ की स्थापना की थी। नगर-जीवन के क्षेत्र में यह विकास का काल था। नदी, पर्वत, और सागर के किनारे अनुकूल जगह को चुनकर इस समय नये नगर बसाये जा रहे थे।
महाभारत में वर्णित कथा के अनुसार प्रारंभ में धृतराष्ट्र से आधा राज्य प्राप्त करने के पश्वात पांडवों ने इन्द्रप्रस्थ में अपनी राजधानी बनाई थी। दुर्योधन की राजधानी लगभग 45 मील दूर हस्तिनापुर में ही रही। इन्द्रप्रस्थ नगर कौरवों की प्राचीन राजधानी खांडवप्रस्थ के स्थान पर बसाया गया था-
तस्मात् त्वं खांडव-प्रस्थं पुरं राष्ट्रं च वर्धय, ब्राह्मणा: क्षत्रिया वैश्या: शूद्राश्च कृत निश्चया:। त्वद्भक्तया जन्तग्श्चान्ये भजन्त्वेव पुरं शुभम्’।।
(महाभारत आदि पर्व 206)
धृतराष्ट्र ने पांडवों को आधा राज्य देते समय उन्हें कौरवों के प्राचीन नगर व राष्ट्र खांडवप्रस्थ को विवर्धित करके चारों वर्णों के सहयोग से नई राजधानी बनाने का आदेश दिया। तब पांडवों ने श्रीकृष्ण सहित खांडवप्रस्थ पहुँचकर इन्द्र की सहायता से इन्द्रप्रस्थ नामक नगर विश्वकर्मा द्वारा निर्मित करवाया-
‘विश्वकर्मन् महाप्राज्ञ अद्यप्रभृति तत् पुरम्, इन्द्रप्रस्थमति ख्यातं दिव्यं रम्यं भविष्यति’।(महाभारत आदि पर्व 206)
इस नगर के चारों ओर समुद्र की भाँति जल से पूर्ण खाइयां बनी हुई थीं, जो उस नगर की शोभा बढ़ाती थीं। श्वेत बादलों तथा चंद्रमा के समान उज्जल परकोटा नगर के चारों ओर खिंचा हुआ था। इसकी ऊंचाई आकाश को छूती मालूम होती थी-
‘सागर प्रतिरुपाभि: परिखाभिरलंकृताम् प्राकारेण च सम्पन्नं दिवमावृत्य तिष्ठता, पांडुराभ्र प्रकाशेन हिमरश्मिनिभेन च शुशुभेतत् पुरश्रेष्ठ्नागैभोर्गव- तीयथा’।
(महाभारत आदि पर्व 206)
इस नगर को सुन्दर और रमणीक बनाने के साथ ही साथ इसकी सुरक्षा का भी पूरा प्रबन्ध किया गया था-
'तल्पैश्चाभ्यासिकैर्युक्तं शुशुमेयोधरक्षितम्
तिक्ष्णांकुश शतध्निभिर्यन्त्र जालैश्च शोभितम्;’ ‘सर्वशिल्पविदस्तत्र वासायाभ्यागमंस्तदा, उद्यानानि च रम्याणि नगरस्य समन्तप: ;’ ‘मनोहरैश्चित्र गृहैस्तथा जगतिपर्वतै: वापीभिविर्विधाभिश्च पूर्णाभि: परमाभ्भसा, रम्याश्च विविधास्तत्र पुष्करिण्यो बनावृता:।।
(महाभारत आदि पर्व 206)
इनमें अस्त्र-शस्त्रों का अभ्यास किया जाता था। ऐसी अनेक अटारियों से युक्त और योद्धाओं से सुरक्षित वह नगर शोभा से संयुक्त था। तीखे अंकुश और शतध्वनियों और अन्यान्य शस्त्रों से वह नगर सुशोभित था।
नगर का स्थापत्य
विधुर पण्डित जातक में इन्द्रप्रस्थ को केवल सात कोश के अन्दर घिरा हुआ बताया गया है, जबकि बनारस का विस्तार 12 कोश तक था। महाभारत, उद्योग पर्व में इन्द्रप्रस्थ को 'शकपुरी' भी कहा गया है।
विष्णु पुराण में इन्द्रप्रस्थ का उल्लेख निम्न प्रकार है-
‘इत्थं वदन्ययौ विष्णुरिन्द्रप्रस्थं पुरोत्तम्’।
इसके उदय और अभ्युदय का रोचक वर्णन महाभारत (आदिपर्व, 207अ.) के अनेक स्थलों पर किया गया है। महाभारत के अनुसार मय असुर ने 14 महीनों तक परिश्रम कर यहीं पर उस विचित्र लंबी चौंड़ी सभा का निर्माण किया था जिसमें दुर्योधन को जल में स्थल का और स्थल में जल का भ्रम हुआ था। इस सभा के चारों ओर का घेरा 10,000 किस्कु (8,750 गज) था। ऐसी रूपसंपन्न सभा न तो देवों की सुधर्मा ही थी और न अंधक वृष्णियों की सभा ही। इसमें 8,000 किंकर या गुह्यक चारों ओर उत्कीर्ण थे जो अपने मस्तकों पर उसे ऊपर उठाए प्रतीत होते थे। राजा युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ का विधान इसी नगर में किया (महाभारत, सभापर्व, 30-42 अध्याय) जिसमें कौरवों ने भी अपना सहयोग दिया था। ऐसी समृद्ध नगरी पर पांडवों को गर्व तथा प्रेम होना स्वाभाविक था और इसीलिए उन लोगों ने दुर्योधन से अपने लिए जिन पाँच गाँवों को माँगा उनमें इंद्रपस्थ ही प्रथम नगर था :
इंद्रप्रस्थं वृक्रप्रस्थं जयंतं वारणावतनम्।
देहि में चतुरो ग्रामान् पंचमं किंचिदेव तु।।
महाभारत (अध्याय 209) में खांडवप्रस्थ शहर का विवरण दिया है, कि कैसे पांडवों ने यह शहर बनाया और बसाया। पांडवों ने श्रीकृष्ण के साथ मय दानव की सहायता से उस शहर का सौन्दर्यीकरण किया। वह शहर एक द्वितीय स्वर्ग के समान हो गया। सागर जैसी चौड़ी खाई से घिरा, स्वर्ग गगनचुम्बी चहारदीवारी से घिरा व चंद्रमा या सूखे मेघों जैसा श्वेत वह नगर नागों की राजधानी, भोगवती नगर जैसा लगने लगा। इसमें अनगिनत प्रासाद, असंख्य द्वार थे, जो प्रत्येक द्वार गरुड़ के विशाल फ़ैले पंखों की तरह खुले थे। इस शहर की रक्षा दीवार में मंदराचल पर्वत जैसे विशाल द्वार थे। इस शस्त्रों से सुसज्जित, सुरक्षित नगरी को दुश्मनों का एक बाण भी खरौंच तक नहीं सकता था। उसकी दीवारों पर तोपें और शतघ्नियां रखीं थीं, जैसे दुमुंही सांप होते हैं। बुर्जियों पर सशस्त्र सेना के सैनिक लगे थे। उन दीवारों पर वृहत लौह चक्र भी लगे थे। नगर के चारों ओर रमणीय उद्यान थे। मनोहर चित्रशालाओं तथा कृतिम पर्वतों से तथा जल से भरी पूरी नदियों और रमणीय झीलों से वह नगर सुशोभित था। यहां की सडकें चौड़ी और साफ थीं। यह कई सुन्दर परिखाओं (खाइयों) द्वारा परिवेष्ठित था, जो अपनी विशालता के कारण लहलहाते सागर की याद दिलाती थी। इस नगर के चतुर्दिक उच्च प्रासाद भी था, जिसमें सुन्दर बुर्ज और दरवाज़े यथास्थान खोले गये थे। नगर की सुरक्षा की दृष्टि से प्रासाद की चोटी पर विध्वंसकारी अस्त्र शस्त्र पहले से ही इकट्ठा कर लिये गये थे।इस शहर को घेरे हुए, कई सुंदर उद्यान थे, जिनमें असंख्य प्रजातियों के फल और फूल इत्यादि लगे थे। इनमें आम्र, अमरतक, कदंब अशोक, चंपक, पुन्नग, नाग, लकुचा, पनास, सालस और तालस के वृक्ष थे। तमाल, वकुल और केतकी के महकते पेड़ थे। सुंदर और पुष्पित अमलक, जिनकी शाखाएं फलों से लदी होने के कारण झुकी रहती थीं। लोध्र और सुंदर अंकोल वृक्ष भी थे। जम्बू, पाटल, कुंजक, अतिमुक्ता, करविरस, पारिजात और ढ़ेरों अन्य प्रकार के पेड़ पौधे लगे थे। अनेकों हरे भरे कुंज यहां मयूर और कोकिल ध्वनियों से गूंजते रहते थे। कई विलासगृह थे, जो कि शीशे जैसे चमकदार थे और लताओं से ढंके थे। यहां कई कृत्रिम टीले थे और जल से ऊपर तक भरे सरोवर और झीलें, कमल तड़ाग जिनमें हंस और बत्तखें, चक्रवाक इत्यादि किल्लोल करते रहते थे। यहां कई सरोवरों में बहुत से जलीय पौधों की भी भरमार थी। वहाँ के सरोवरों का जल खिले हुये कमलों के द्वारा सुगन्धित हो रहा था। स्थान-स्थान पर रमणीक उपवन भी थे, जो फल-पुष्प के सौरभ से आह्लादित कर देते थे। नगर के भीतर विभिन्न भागों में चित्ताकर्षक चित्रशालायें बनी थीं। खाई के जल में हंस, कारण्डव तथा चक्रवाक आदि पक्षी तैरते रहते थे और उनसे पुर की छटा अन्वेक्षणीय थी। भव्य महलों, अट्टालिकाओं और प्रासादों से सुसज्जित यह नगरी इंद्र की अमरावती से मुकाबला करती थीं। इस कारण ही इसे इंद्रप्रस्थ नाम दिया गया था। इस शहर के सर्वश्रेष्ठ भाग में पांडवों का महल स्थित था। इसमें कुबेर के समान खजाना और भंडार थे। इतने वैभव से परिपूर्ण इसको देखकर दामिनी के समान आंखें चौधिया जाती थीं।
जब शहर बसा, तो वहां बड़ी संख्या में विद्वान् और कलाकार आए, जिनके पास सभी वेद-शास्त्र इत्यादि थे, व सभी भाषाओं में पारंगत थे। यहां सभी दिशाओं से बहुत से व्यापारीगण पधारे। उन्हें यहां व्यापार कर द्न संपत्ति मिलने की आशाएं थीं। बहुत से कारीगर वर्ग के लोग भी यहां आ कर बस गए। यहा के नागरिक विद्या-विनय से सम्पन्न, सभ्य और धर्मपरायण थे। उनमें से कुछ ऐसे थे, जो कई भाषाओं को बोल लेते थे, कुछ कई तरह के शिल्पों पर अधिकार रखते थे। धन प्राप्ति की इच्छा से वहाँ पर विभिन्न दिशाओं के वणिक आते थे। विभिन्न पुर-भागों में धवल तथा उत्तुंग भवन सुशोभित थे। अपनी विलक्षण शोभा द्वारा यह नगर अमरावती की छटा का स्मरण दिला रहा था। महाभारत में आने वाला यह इन्द्रप्रस्थ-वर्णन इस नगर का सर्वोत्तम निरूपण है, जिससे उसके पुराने ठाट-बाट और ऐश्वर्य का ज्ञान होता है।
◾युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ इन्द्रप्रस्थ में ही किया था। महाभारत-युद्ध के पश्चात् इन्द्रप्रस्थ और हस्तिनापुर दोनों ही नगरों पर युधिष्ठिर का शासन स्थापित हो गया। हस्तिनापुर के गंगा की बाढ़ में बह जाने के बाद 900 ई. पू. के लगभग जब पांडवों के वंशज कौशांबी चले गये तो इन्द्रप्रस्थ का महत्त्व भी प्राय: समाप्त हो गया। डॉ बी बी लाल ने अपनी पुस्तक इंद्रप्रस्थ में लिखा है कि महाभारत, मत्स्य और वायु पुराण के अनुसार महाभारत युद्ध के बाद निचाक्यु के शाशनकाल में बाढ़ आने के कारण राजधानी को हस्तिनापुर से कौशांबी लाया गया था।
वर्तमान इंद्रप्रस्थ
आजकल नई दिल्ली में जहाँ पांडवों का पुराना क़िला स्थित है, उसी स्थान के परवर्ती प्रदेश में इन्द्रप्रस्थ नगर की स्थिति मानी जाती है। पुराने क़िले के भीतर कई स्थानों का संबंध पांडवों से बताया जाता है। दिल्ली का सर्वप्राचीन भाग यही है। जिस पौराणिक नगरी की मिट्टी ने दिल्ली के पुराने किले की नींव को थाम रखा है उसका इतिहास महाभारत काल से प्रारंभ होता है खांडवप्रस्थ कि जिस उजाड़ बंजर और दुर्गम भूमि पर पांडवों ने स्वर्ग के समान अपनी राजधानी इंद्रप्रस्थ को बसाया था उसी भूमि पर आज यह अकेला खड़ा है, कहने का अर्थ है इस किले की मिट्टी आज भी पांडवों के समक्ष गवाही देती है और वह भी अकेले में विभिन्न स्थानों पर यह है कि यहां खुदाई में मिले अवशेषों के आधार पर यह पांडवों की राजधानी के समय की गवाही देती है और वह भी साक्ष्यों के साथ पुराने किले में विभिन्न स्थानों पर यह वाक्य लिखे हैं कि यहां खुदाई में मिले अवशेषों के आधार पर पुरातत्व विधियों का एक बड़ा वर्ग मानता है कि पांडवों की राजधानी इसी स्थान पर थी। इस विषय पर पहला यह है कि यहां खुदाई में ऐसे बर्तनों के अवशेष मिले हैं जो महाभारत से जुड़े अन्य स्थानों पर भी मिले हैं इसके अलावा महाभारत से जुड़े प्रसंग और प्राचीन परंपराएं भी इसी ओर संकेत करती है कि पांडवों की राजधानी इंद्रप्रस्थ इसी स्थान पर थी।दिल्ली के निकट 'इन्द्रपत' नामक ग्राम अभी तक इन्द्रप्रस्थ की स्मृति के अवशेष रूप में स्थित है। इस बारे में एक सबसे बड़ा तथ्य यह है कि इंद्रप्रस्थ के अपभ्रंश इंद्रपत नाम का एक गाँव 1913 तक था। राजधानी नई दिल्ली का निर्माण करने के दौरान उसे भी हटा दिया गया था । लेकिन क्या महाभारत कथा बन के रह गया था ? तो इसका उत्तर तीसरे तथ्य से मिलता है और वह यह है कि नई दिल्ली के रायसीना क्षेत्र में सर्व नाम का एक गांव है जहां से 1327 ईसवी का संस्कृत भाषा का एक अभिलेख प्राप्त हुआ यह अभिलेख लाल किले के संग्रहालय में संरक्षित है इस अभिलेख में इंद्रप्रस्थ का उल्लेख है यानी हुमायूं से पहले तक इंद्रप्रस्थ एक बड़ा नगर था जिसके अंतर्गत कई काम आते थे महाभारत के अनुसार कुरु देश की राजधानी हस्तिनापुर थी । पांडवों और उनके चचेरे भाई कौरवों के बीच संबंध बिगड़ गए तो कौरव के पिता धतराष्ट्र ने पांडवों को यमुना के किनारे खांडवप्रस्थ का क्षेत्र दे दिया। इंद्रप्रस्थनगर यही पुराने किले के स्थान पर बसा था पुराने किले का इंद्रप्रस्थ वही महाभारत का इंद्रप्रस्थ है।
संभवतः खांडव वन की स्थिति वर्तमान मेरठ के निकटवर्ती क्षेत्र में थी। जान पड़ता है कि वास्तव में खांडव वन दिल्ली के इंद्रप्रस्थ नामक स्थान के निकट (पुराने किले के आसपास) रहा होगा, क्योंकि पांडवों की राजधानी इंद्रप्रस्थ, इसी वन को जला डालने पर जो स्वच्छ भू-भाग प्राप्त हुआ था उसी में बसाई गई थी। किंतु यह भी संभव है कि यह वर्तमान दिल्ली से लेकर मेरठ तक के क्षेत्र में विस्तृत था। खांडवप्रस्थ, हस्तिनापुर के पास एक प्राचीन नगर था जहां महाभारतकाल से पूर्व पुरुरवा, आयु, नहुष तथा ययाति की राजधानी थी। कुरु की यह प्राचीन राजधानी बुधपुत्र के लोभ के कारण मुनियों द्वारा नष्ट कर दी गई। युधिष्ठिर को, जब प्रारंभ में, द्यूत-क्रीडा से पूर्व, आधा राज्य मिला तो धृतराष्ट्र ने पांडवों से खांडवप्रस्थ में अपनी राजधानी बनाने तथा फिर से उस प्राचीन नगर को बसाने के लिए कहा था। (महाभारत आदि पर्व, 206 दक्षिणात्य पाठ) तत्पश्चात पांडवों ने खांडवप्रस्थ पहुंच कर उस प्राचीन नगर के स्थान पर एक घोर वन देखा। (आदि पर्व: 206, 26-27) खांडवप्रस्थ के स्थान पर ही इंद्रप्रस्थ नामक नया नगर बसाया गया जो भावी दिल्ली का केंद्र बना। खांडवप्रस्थ के निकट ही खांडववन स्थित था जिसे श्रीकृष्ण और अर्जुन ने अग्निदेव की प्रेरणा से भस्म कर दिया। खांडवप्रस्थ का उल्लेख अन्यत्र भी है। पंचविंशब्राह्मण 25,3,6 में राजा अभिप्रतारिन् के पुरोहित द्दति खांडवप्रस्थ में किए गए यज्ञ का उल्लेख है। अभिप्रतारिन् जनमेजय का वंशज था। पद्मपुराण ने इंद्रप्रस्थ में युमना को अतीव पवित्र तथा पुण्यवती माना है :
यमुना सर्वसुलभा त्रिषु स्थानेषु दुर्लभा।
इंद्रप्रस्थे प्रयागे च सागरस्य च संगमे।।
यहाँ यमुना के किनारे 'निगमोद्बोध' नामक तीर्थ विशेष प्रसिद्ध था। इस नगर की स्थिति दिल्ली से दो मील दक्षिण की ओर उस स्थान पर थी जहाँ आज हुमायूँ द्वारा बनवाया 'पुराना किला' खड़ा है। इंडिया-वाटर-पोर्टल वेबसाईट के अनुसार इंद्रप्रस्थ वर्तमान दिल्ली के समीप इंदरपत गाँव का प्राचीन नाम। यह नगर शक्रप्रस्थ, शक्रपुरी, शतक्रतुप्रस्थ तथा खांडवप्रस्थ आदि अन्य नामों से भी अभिहित किया गया है।
दिल्ली के पुराना किला के महाभारत के साथ संबंध की बात, हमेशा से एक अबूझ पहेली रही है। महाकाव्य में पाडंवों की राजधानी इन्द्रप्रस्थ से इस लोकप्रिय स्मारक के जुड़ाव की गुत्थी को पुरातत्व की सहायता से सुलझाने का प्रयास है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने पुराना किला के पास शेर मंडल में चित्रित मिट्टी के बर्तनों के मिलने की आशा में उत्खनन आरंभ किया है, जिससे यह सिद्ध हो सकेगा कि महाभारत काल में यह किला आबाद था। इससे पहले भी भारतीय पुरातत्वीय सर्वेक्षण ने पुराना किला में 1955, 1969 और 1973 में उत्खनन कार्य किया था। ऐसी प्रबल मान्यता है कि पांडवों की राजधानी इन्द्रप्रस्थ ही वर्तमान की दिल्ली का पुराना किला है। शम्स सिराज अफीफ की 14 वीं सदी में लिखी किताब "तारिख-ए-फिरुजशाही" में लिखा है कि इन्द्रप्रस्थ किसी परगना का मुख्यालय हुआ करता था। पश्चिम दिल्ली के नारायणा गांव से 14 वीं सदी के एक अभिलेख में भी इन्द्रप्रस्थ का उल्लेख है। अबुल फजल ने 16 वीं सदी में लिखी अपनी पुस्तक "आइन-ए-अकबरी" में लिखा है कि हुमायूं का किला उसी स्थान पर बनाया गया था जहां कभी पांडवों की राजधानी इन्द्रप्रस्थ अवस्थित थी। अंग्रेजों और यहां तक कि मुगलों के दौर के किताबों और गजेटियर में दिल्ली का नाम इंद्रप्रस्थ मिलता है। तुगलक ए तारीखें में भी इंद्रप्रस्थ का नाम मिलता है। इतिहासकार उपन्दिर सिंह अपनी पुस्तक "प्राचीन एवं पूर्व मध्यकालीन भारत का इतिहास पाषाण काल से बारहवीं शताब्दी तक" में लिखती है कि वास्तव में 19 वीं सदी के अंत तक पुराने किले के भीतर इन्द्रप्रस्थ नाम का एक गांव हुआ करता था। "दिल्ली अतीत के झरोखे से" पुस्तक में मंजू सिन्हा लिखती है कि पुराना किला इंद्रपत गांव के क्षेत्र में है। शायद इन्द्रप्रस्थ बदलते बदलते इंद्रपत हो गया। इन्द्रपत गांव के लोगों की धारणा है कि वहां पाई जाने वाली पुरानी हिन्दू इमारतें पांडवों की राजधानी से सम्बंधित है। यह तथ्य है कि इन्दरपत के नाम से जाना जाने वाला एक ग्राम, जो स्पष्ट है कि इन्द्रप्रस्थ का अपभ्रंश है, वर्तमान शताब्दी के प्रारंभ तक पुराना किला में स्थित था जबकि उसको अन्य गांवो के साथ राजधानी नई दिल्ली का निर्माण करने के लिए हटाया गया।
इस दौरान तत्कालीन वायसराय लॉर्ड हार्डिंग ने कहा था दिल्ली अभी भी एक मायावी नाम है। हिंदुओं के दिलों दिमाग में यह नाम बहुत सारे ऐसे पवित्र प्रतीकों और किंवदंतियों से जुड़ा हुआ है, जो इतिहास के प्रारंभ बिंदु से भी पुराने हैं। दिल्ली के मैदान में ही पांडव राजकुमारों ने कौरवों के साथ एक भीषण युद्ध लड़ा था जिसमें अंततः महाभारत की रचना हुई और यमुना तट पर ही पांडवों ने प्रसिद्ध यज्ञ किया था जिसमें उनकी ताजपोशी हुई थी। पुराना किला आज भी उसी जगह आबाद है जहां उन्होंने इस शहर की बुनियाद डाली थी और इसे इंद्रप्रस्थ का नाम दिया था। अलेक्जेंडर कनिंघम ने भी पुराने किले के बारे में लिखा है शेरशाह और हिमायू ने तो उस पुराने किले की मरम्मत कराई और उसे ही क्रमशः शेरगढ़ और दिनपनाह का नाम दे दिया। आदित्य अवस्थी अपनी किताब "नीली दिल्ली प्यासी दिल्ली" में लिखते हैं कि पुराना किला दिल्ली के दो पुराने और ऐतिहासिक शहरों-दीन पनाह और शेरगढ़ का केंद्र रहा है। यह भी माना जाता है कि यह किला उसी जगह पर बना माना जाता है, जहां महाभारत काल में इंद्रप्रस्थ का किला हुआ करता था।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की प्रकाशित पुस्तक दिल्ली और उसका अंचल के अनुसार, मूलतः पुराना किला यमुना किनारे स्थित था। इस किले के उत्तरी और पश्चिमी किनारों पर भूमि का गहरा दबा होना यह संकेत देता है कि इन किनारों पर नदी से जुड़ी हुई एक चौड़ी खाई मौजूद थी और किले में मुख्य भूमि से किले को जोड़ने वाले एक उपसेतु के जरिए पहुंचा जाता था। पुराना किला प्राचीन टीले पर स्थित है जिसमें शायद महाभारत के इन्द्रप्रस्थ नगर के खंडहर छिपे हैं।
"दिल्ली और उसका अंचल" बताती है कि सन् 1955 में पुराने किले के दक्षिणी-पूर्वी भाग में परीक्षण के तौर पर प्रसिद्ध पुरातत्वविद् बीबी लाल द्वारा खोदी गई कुछ खाइयों में बाद के कुछ स्मृतिचिन्ह और अवशेषों के अलावा चित्रित भूरे रंग के बर्तनों के टुकड़े निकले। चूँकि ऐसे लक्षणों वाले बर्तन महाभारत की कहानी से सम्बद्व अनेक स्थलों पर पहले भी पाये गए थे और इनका काल 1500 ईसा पूर्व निर्धारित किया गया था, इनके यहां से प्राप्त होने से महाभारत के प्रसिद्व पांडवों की राजधानी इन्द्रप्रस्थ का पुराने किले के स्थल पर होने को बल मिला। बीबी लाल के नेतृत्व में पुनः 1969- 70 में दोबारा खुदाई शुरु हुआ लेकिन पूरा नहीं हो पाया। 65 वर्ष बाद भी किले का सिर्फ 5 प्रतिशत भाग का ही परीक्षण और खुदाई हुआ है। इंद्रप्रस्थ में खुदाई में जो पीजीडब्ल्यू मिला वही हस्तिनापुर में भी मिला। पुराना किला के मुख्य प्रवेश द्वार से घुसते ही दाहिनी तरफ एक पुरातत्वीय संग्रहालय भी है। यहां पर भारतीय पुरातत्वीय सर्वेक्षण की ओर से पुराना किला में किए उत्खनन कार्य (1955 में और फिर दोबारा 1969-1973 तक) मिली वस्तुएं प्रदर्शित है।
इंद्रप्रस्थ का उल्लेख पाली रूप के तहत, इंदपट्ट, बौद्ध ग्रंथों में भी कुरु महाजनपद की राजधानी के रूप में उल्लेख किया गया है। जहां इसे यमुना नदी पर स्थित कुरु साम्राज्य की राजधानी के रूप में वर्णित किया गया है। बौद्ध साहित्य में हथिनीपुरा (हस्तिनापुर) और कुरु साम्राज्य के कई छोटे शहरों और गांवों का भी उल्लेख है। इंद्रप्रस्थ ग्रीको-रोमन दुनिया के लिए भी जाना जाता हो सकता है: इसका उल्लेख टॉलेमी के भूगोल में दूसरी शताब्दी सीई से "इन्दबारा" शहर के रूप में किया गया है, जो संभवतः प्राकृत रूप "इंडबट" से लिया गया है, और जो दिल्ली के आसपास के क्षेत्र था।
वर्तमान में भी किले के चारों तरफ़ एक गहरी खंदक है, जिसे युद्ध के समय यमुना नदी के पानी से भर दिया जाता था। आज कल इस खंदक का प्रयोग पर्यटकों के लिए बोटिंग करने के लिए प्रयोग में लाया जा रहा है।





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